तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय, कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।
तिनका कबहुँ ना निन्दिये , जो पाँवन तर होय , कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े , तो पीर घनेरी होय। अर्थ : कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है . यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है ! मैं आप लोगों को एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ। ' आओ , हम लोग एक दूसरे को बुरा कहना बंद कर दें ', और उन्हे इस बात का बड़ा खेद हैं कि लोगों में सदा इतना मतभेद क्यों रहता हैं । परन्तु मैं समझता हूँ कि जो कहानी मैं सुनाने वाला हूँ , उससे आप लोगों को इस मतभेद का कारण स्पष्ट हो जाएगा । एक कुएँ में बहुत समय से एक मेढ़क रहता था । वह वहीं पैदा हुआ था और वहीं उसका पालन - पोषण हुआ , पर फिर भी वह मेढ़क छोटा ही था । धीरे - धीरे यह मेढ़क उसी कुएँ में रहते रहते मोटा और चिकना हो गया । अब एक दिन एक दूसरा मेढ़क , जो समुद्र में रहता था , वहाँ आया और कुएँ में गिर पड़ा । ...